सेक्स कहानी पाठिका को चोदा-5

यह कहानी एक सीरीज़ का हिस्सा है:

सेक्स कहानी पाठिका को चोदा-4

सेक्स कहानी पाठिका को चोदा-6

मैं घूमकर उसके सामने आ गया उसके नुकीले उभारों के बीच। अभी तक हम अगल बगल बैठे थे। वह अपने वक्ष को ढकने लगी, मैंने उसकी कलाइयाँ पकड़कर लीं। उसके दोनों उरोज अजब चालू सी नुकीली डिजाइन के कपों में बंद थे और यूँ अलग अलग थे जैसे दो सहेलियाँ एक-दूसरे से मुँह फुलाए दो तरफ देख रही हों। “माई गॉड, कमाल का जोड़ा है, वन्डरफुल!”

वह हाथ छुड़ाने लगी। मैं उसकी कसमसाहट और स्तनों के सस्ते दृश्य का आनन्द लेता रहा। उरोजों के नीचे पतला पेट ऊपर-नीचे हो रहा था, उस पर मैंने चुम्बन लिये। जब उसने जोर लगाना बंद किया तो मैंने हाथ छोड़ दिए।
“अगले चियर्स का समय आ गया।” मैंने चोली के बटनों पर हाथ लगाया।

उसने मेरे दोनों गालों पर दोनों हाथों से एक चपत लगा दी- बहुत बोलते हैं लीलाधर जी आप!
बटन खुलते गए और नीली चोली के अंधेरे से सफेद ब्रा का उजाला प्रकट होने लगा।
“मुझे औरतों के कपड़ों की एक बात मजेदार लगती है … उनकी चोली के हुक सामने होते हैं और ब्रा की हुक पीछे।”

“लगता है, कल्पना जी केवल सामने हुक वाली चोली पहनती हैं। पीछे हुक वाली चोली भी होती है।”
“कल वही पहनकर आना।”
“कल?” खिलखिलाकर हँसी- पागल हैं आप!
पल्लों को उसके कंधों से खिसकाता हुआ बोला- क्यों, मुश्किल है क्या? इस दुर्लभ ब्यूटी से एक दिन में बिल्कुल नहीं मन भरेगा।
“पहले आज की तो कर लो।”
“क्या कर लूँ?” मैंने बड़ी मासूमियत से पूछा।
उसने अपने हाथ से मेरा मुँह बंद कर दिया- प्लीजऽऽ डोंट से एनीथिंग मोर! (कृपया और कुछ मत बोलिए.)

मेहनत से मैंने चोली को खिसका खिसकाकर उसके कंधों और बाँहों से निकाला। एक खुशबू फैल गई, डियो और पसीने और उसके बदन की गंध मिली हुई।
“बड़ी खूबसूरत है। ये ब्रा भी क्या उन्हीं की च्वायस है?” हालाँकि ब्रा भी उसी चालू नुकीली डिजाइन की थी जो सड़क पर रिझानेवाली औरतें पहनती हैं। शायद इसके पति की च्वाइस ही ऐसी है। फिर भी उसमें सफेद रेशमी बेलबूटों का काम सुंदर था।
“ये पूरी सेट उन्हीं की च्वाइस है, बर्थडे प्रेजेंट!”
“वाह, इस बर्थडे प्रेजेंट के बाद एक सुंदर बर्थ डे सूट में … आह! काश आज आपका बर्थडे ही होता तो मजा आ जाता।”
वह सिहर सी गई- लीलाधर जी, प्ली … ज ! आप बातों से ही मार डालोगे।

मैंने ग्लास उठाया और हवा में लहरा दिया- चियर्स फॉर दिस स्पेशल ब्रा!
अब उसमें इतना दम नहीं बचा था कि वह अपना ग्लास उठाकर जवाबी चियर्स करती।

घूंट लेकर ग्लास रखकर मैंने उसके ब्रा-मंडित वक्षों को दबोच-सा लिया- कितने मुलायम हैं ये!
वह मुझमें लिपटने लगी लेकिन मैं बीच में हाथ चलाने लायक दूरी बनाए रहा- वाह कितने भरे-भरे! वन्डरफुल! आय लव देम!

उसकी असहाय स्थिति, तेज साँसें, लाल चेहरा, सिर्फ ब्रा और साये की अर्धनग्न अवस्था देखकर मुझे गंभीर होना पड़ा। हाथ बढ़ाकर पीछे ब्रा की हुक खोली और स्तनों को आजाद कर दिया।
दो नन्हें शिशु-जैसे उरोज … भयभीत, मानों कलेजे से चिपके हुए। उलटकर रखे दो गेंदे के बड़े फूल, जिनकी हरी मुंडियों जैसे निकले चूचुक! दो बड़े स्तूपों के शिखर पर बने हुए दो नन्हें लिंग, सिक्के जितनी चौड़ी परछाई के बीच! मैं देखता रह गया- यौवन और मातृत्व के दो उन्नत प्रतीक!

वह मेरे आश्चर्यचकित चेहरे को आश्चर्य से देख रही थी- कभी स्तन नहीं देखे क्या? लीलाधर … प्लीज!
मैं आपे में वापस आया, उसके हाथ छोड़ दिए। शराब उठाई और कहकहा लगाया- मैं गुण्डा हूँ ना? चियर्स फॉर दिस वन्डरफुल चूची!”
“गजब हैं आप!” उसने झट स्तनों को छिपा लिया।

“इसका चियर्स तो तुम्हें करना ही पड़ेगा।” मैंने उसका ग्लास उठाकर उसे ऑफर किया। मगर उसके हाथ स्तनों पर थे।
मैंने खुद ही उसका गिलास उठाकर अपने गिलास से टकराकर चियर्स कर लिया- तुम नए जमाने की लड़की हो, फिर भी इतना शरमाती हो?
मैं पीने लगा।

वह बोली- सिर्फ मेरी ही चियर्स करते रहेंगे?
“ये हुई न बात!” मैंने झट अपनी टी-शर्ट उतार दी।
उसने प्रशंसा से मेरे सीने से को देखा। मुझसे सट गई ताकि अपने वक्षों को दिखाने से बच सके। सिर झुकाए ही मेरे सीने पर हाथ फेरती हुई बोली- चीयर्स!”
“अरे ऐसे नहीं। बाकायदे करो।” मैंने ग्लास उठाकर उसके हाथ में दे दिया।

“चियर्स!”
“फ़ॉर?” मैंने पूछा।
उसने मेरे सीने से ग्लास छुला दिया और बोली- फॉर दिस … ”
“दिस क्या? बोलो बोलो।” मैं उसकी हिचक मिटाना चाह रहा था।

नशे में तो आ ही गई थी, उसने ग्लास से घूँट लेकर अटकते अटकते पूरा किया- फॉर दिस वन्डरफुल चेस्ट!
“हा हा हा … !” मैं ठठाकर हँस पड़ा- हम लोगों के सीने में कुछ होता है भला। सब कुछ तो तुम लोगों के होता है।

उसने मेरे सीने पर दबाव दिया और मैं पीछे लेट गया। वह खुद अधलेटी होकर मेरे ऊपर आ गई।
वह मेरी छाती के बालों में हाथ फेरने लगी। वहाँ पके खिचड़ी बालों को पर अपने गाल फिरा रही थी, चूम रही थी। छाती पर पड़ता एक एक चुम्बन पानी में पारे की बूंद-सा सीधे दिल में उतर जा रहा था। छाती पर उसके सिर के बालों के फिरने का एहसास बड़ा ही मादक था।
“नीता … इतना प्यार करोगी तो कल जा नहीं पाऊँगा।”

वह मेरी जींस के बड़े से उभार पर भी एक दो बार हाथ ले गई। उसकी इच्छा समझकर मैं अपने जींस का बटन खोलने लगा। अभी कुछ देर पहले उसकी शर्माहट देखते हुए यह प्रगल्भता नई थी। मैंने जिप खींची और जींस को उतार दिया।
अंडरवियर में बड़ा सा उभार देखकर उसकी आँखों में आया खुशी का भाव बालों के बीच चेहरा आधा छिपा रहने के बावजूद छिपा न रह सका। एक युवा लड़की की मेरे जैसे अधेड़ के लिए ऐसी उत्सुकता अहं को बहुत संतोष देनेवाली थी।

लिंग जोर जोर धड़क रहा था। बगल से उसके स्तनों का सुंदर दृश्य दिख रहा था। पसली से उभरे अधगोले- लचकते हुए, नन्हें चूचुकों को पीने की टोंटी की तरह आगे बढ़ाए हुए। मैंने उन्हें नीचे से हथेलियों का आधार देकर दबाया।
उसने अपना ग्लास उठाया और बोली- चियर्स!
“ये किस चीज की चियर्स?”
उसने ग्लास मेरी चड्डी के उभार से छुला दिया।
“अय हय ऽऽऽ ” मेरा लिंग दनादन दो-चार धुकधुकियाँ लगा गया। मैंने उसके स्तनों को मोटर के हॉर्न की तरह जोर जोर दबा दिया।

“अब मेरी चियर्स की बारी है।” मैंने उसके कंधे खींचकर लिटा दिया। कमर में उंगली घुसाकर साये की गाँठ की डोर निकाली और खींच दी। साया ढीला पड़ गया। कमर में डोर धँसने का दाग पड़ गया था, उसे मैंने सहलाया।
वह दोनों हाथ अपनी छातियों पर दबाए रही और मैंने उसके नितंबों को उठाकर साये को घुटनों से नीचे कर दिया।

अभी तक इसने अपने युवा पति का अधीर संभोग ही देखा होगा। अब प्रौढ़ का धैर्यपूर्ण संभोग देखेगी।

लिंग के कष्टदायी तनाव को अनसुना कर मैं देखने लगा कुदरत के रचे इस अदभुत सौंदर्य को- सिर से पैर तक खुला, नंगा। मेरी पत्नी से कुछ कम भरे वक्ष, लेकिन उसके जैसी ही पतली कमर, भरी जांघें, गोल घुटने, चौड़ी पिंडलियाँ, सुंदर पतली एड़ियाँ। ऊपर से नीचे तक सब कुछ चिकना, रोमरहित। मेरी पत्नी का अथाह नवयौवन जैसे अपने थोड़े कमतर संस्करण के साथ प्रत्यक्ष हो गया था।
समुद्र के ढेव की तरह उठान और ढलान लिए देह। बीच में पैंटी से ढका तिकोना भग-प्रदेश एक द्वीप की तरह उठा हुआ था। उसे देखकर उसमें ढके खजाने को तुरंत उद्घाटित कर देने की अधीरता रोक पाना किसी भी रतिसमर्थ पुरुष के लिए संभव नहीं था।
मैंने गलास उठाया, पैंटी के उभार पर तर्जनी से ठकठक की और जोर से बोला- चियर्स फार दिस ब्यूटीफुल पस्सी, चियर्स फॉर दिस ब्यूटीफुल पैंटी!
शराब की एक भरपूर घूँट मैंने प्याले से खींच ली। चुस्कियों का मौसम बीत चुका था।

“इस्स्स … ” चोट खाकर एक सिसकारी उसके होंठों से निकल भागी।

मैंने उसकी चंचल कमर को कसकर पकड़ा और पैंटी पर थोड़ी शराब गिराकर उसे चूसने लगा। हवा और रस की फुहारें मेरे मुँह और नथुनों में उतरने लगीं- शराब … योनि का रस … उसकी खास अजीब बू … पैंटी के कपड़े का अपना स्वाद … रस से छलछलाती स्त्री देह! मुझे उसे स्थिर रखने में ताकत लगानी पड़ रही थी।
“ओह ओह ओह … ये क्या कर रहे हैं … आह … आह… ऊह…!” आ जाइये लीलाधर अब, आह … !!”

वह रति के लिए बुला रही थी। मैंने उसके भगों को चूसने के लिए पैंटी की पट्टी एक तरफ खिसकाई। बालों को देखकर इच्छा मर गई। मैं उसके वक्षों की ओर मुड़ा। क्षुब्ध होकर वह बगल को ओर मुड़ गई। “नहीं दूंगी।”
“दो न, प्लीज़!” मैंने बच्चे की जिद का अभिनय किया।
वह वैसे ही मुड़ी रही।

“ठीक है मत दो।” मैंने उसकी पैंटी में हाथ घुसा दिया। पाव रोटी जैसे मुलायम उभार को सहलाने लगा। होंठों के बीच को उंगली डाली तो वह छटपट करने लगी। मैं कमर को जोर से पकड़े रहा।
मैंने उसे मनुहार से कान में कहा- तुम्हारी आखिरी चीयर्स बाकी है, ले लो।

मैंने उसका हाथ पकड़ कर अपनी चड्डी के उभार पर लगा दिया।
वह बाँध के पानी की तरह मचल रही थी। मैं उससे लिपटकर उसके बदन को सहलाने लगा- पीठ, कमर, नितंब, काँख के नीचे के संवेदनशील हिस्से।
वह मेरी चड्डी के उभार को सहलाने लगी।
“इसे उतारो।” मैंने कहा।
उसने मेरी चड्डी में हाथ घुसाया। नंगे लिंग को, फोतों को पकड़कर भींचने लगी। मेरा अस्त्र मुझी पर चला रही थी। चलो, इतना बेशर्म तो बनी।

लेकिन ऐसे तो मैं झड़ ही जाऊंगा; मैंने उसका हाथ खींचकर निकाला और कहा- मेरी चड्डी को उतारो। इसकी चीयर्स तुमको करनी है।
मैंने उसकी पैंटी में उंगली फँसाकर कहा- मेरी चीयर्स उसके बाद आएगी।
वह मुझसे लिपटे लिपटे ही मेरी चड्डी खिसकाने लगी।
मैंने कहा- ऐसे नहीं।
उसे उठा कर बैठा दिया- अब उतारो प्यार से।
“बड़े शैतान है आप!”

मैंने एक योगासन की मुद्रा में कमर उठा दी। उसने मेरी चड्डी खींची। इलास्टिक लिंग की नोक के पास अटकी। उससे बाहर निकालते ही लिंग स्प्रिंग की तरह उछलकर हवा में तन गया।
मुझे लगा इस नायाब लॉलीपॉप को मुँह में लेने से वह रोक नहीं पाएगी।
लेकिन उसने गिलास उठा लिया, बोली- चियर्स!
“फॉर ह्वाट?”
उसने पहले की भांति लिंग से ग्लास छुला दिया।
“ऐसे नहीं … शब्द बोलो।”
“फॉर दिस अँऽऽऽ…”
“बोलो बोलो।”
“फॉर दिस बिग बल्ज!” वह हँस पड़ी। एक घूँट ली।
“हिंदी शब्द बोलो।”
“ल ल ल ल … नईं, वो बड़ा गंदा है”
“हाँ हाँ, ठीक है, पूरा बोलो!” मैंने बढ़ावा दिया।

उसने एक क्षण सोचा, फिर साँस खींची और कह दिया- लंड!
और गिलास खाली कर दिया बिल्कुल मरदों जैसी फिल्मी स्टाइल में।
स्त्री मुख से इस घोर वर्जित शब्द का उच्चारण एक तीखी गैस की तरह मेरे माथे में चढ़ गया। मैंने लपककर उसे खींचा और पलटकर अपने नीचे ले आया।
“लंड, लंड, लंड!” मैंने उसके मुंह पर जोर जोर से तीन बार कहा और उसकी पैंटी खिसकाने लगा।

उसकी आँखों में लाल रेशे वैसे ही चमक रहे थे जैसे मेरे कठोर लिंग पर नसें। उसने खिलखिलाकर अपनी बाँहें मेरे गले में कस दीं। मैंने व्याकुल होकर उसके होंठों पर अपने होंठ गाड़ दिये। इन्हीं खिलखिलाते होंठों से ऐसा गंदा शब्द निकला था! मैंने उन होंठों को चबा लिया। उसने मेरे चेहरे को दबोच लिया और मेरे ऊपरी होंठ पर दाँत गड़ा दिये। मेरी नंगी पीठ, गरदन, कमर पर हाथ फिराते हुए उसने नाखूनों की खराशें छोड़ दी।

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धन्यवाद.