अधूरे सपनों की दास्तान-4

यह कहानी एक सीरीज़ का हिस्सा है:

अधूरे सपनों की दास्तान-3

अधूरे सपनों की दास्तान-5

मेरी सेक्सी कहानी में अभी तक आपने पढ़ा कि मैंने अपनी बहन और भी को सेक्स करते देखा तो वे दोनों मुझे समझाने लगे कि वे क्या कर रहे थे. उन्होंने मुझे बताया कि वे दोनों एक दूसरे के यौन अंगों की खुजली मिटा रहे थे.
अब आगे:

“अरे.. सुनो तो सही, तुम्हें यकीन नहीं न.. लेकिन ऐसा ही होता है, इसीलिये तो लड़का लड़की की शादी की जाती है कि वे अपने कमरे में जब भी उन्हें खुजली हो.. वह मिटा सकें।”
“शाहिद भाई और शाजिया अप्पी यही तो कर रहे थे जब पकड़े गये थे, लेकिन उनकी आपस में शादी नहीं हुई थी तो इसीलिये तमाशा बन गया।”
“मुझे यकीन नहीं।” मैंने अविश्वास भरे स्वर में कहा।
“अच्छा डेमो दे के दिखायें? क्योंकि इस समय भी मुझे और अहाना दोनों को बुरी तरह खुजली हो रही है।”
“दिखाओ।”

“चल अहाना.. रजिया को यकीन नहीं कि ऐसा होता है, इसे करके ही दिखा देते हैं।”
“ठीक है।”
उसने झट से कुर्ता उतारा, ब्रेसरी तो रात में पहनती ही नहीं थी और फिर झुक कर सलवार और पैंटी भी उतार दी।

“हाय.. तुम्हें शर्म नहीं आ रही.. राशिद भाई के सामने नंगी हो गयी एकदम? छी…” मुझे एकदम इतनी तेज शर्म आई कि चेहरा तक गर्म हो गया।
“तो पहन लूं कपड़े और तड़पती रहूं खुजली लिये।” अहाना ने मुंह बनाते हुए कहा।
“अरे तो सलवार खिसका के मुनिया खोल देती.. पूरी नंगी होने की क्या जरूरत थी?”

“मैं बताता हूँ। अभी समझ में आ जायेगा।” राशिद ने अपनी लोअर उतारते हुए कहा और खुद भी नंगा हो गया।

फिर उसने मेरे पास ही अहाना की दोनों टांगें पकड़ कर तख्त के किनारे खींच लिया और उन्हें फैला कर अपना लिंग उसकी मुनिया पर रगड़ने लगा।

मैंने गौर से अहाना की योनि देखते हुए खुद की योनि से उसकी तुलना की.. जाहिरी तौर पर तो वह एकदम मेरे जैसी ही थी। बहनें होने की वजह से यह समानता तो होनी ही थी। क्या वह अंदर से भी मेरे जैसी ही थी?

“अब तुम देखो.. क्या यह ऐसे घुस सकता है?” राशिद ने मेरी तरफ देखते हुए कहा।
“नहीं.. वही तो मैं कह रही हूँ कि कैसे भी नहीं घुस सकता, मुझे उल्लू न बनाओ। बड़े होशियार बनते हो।”
“अरे बाबा, तेरे सवाल का जवाब ही दे रहा हूं, जो पूछ रही थी कि कपड़े क्यों उतारे। यह ऐसे नहीं घुस सकता, जब तक अहाना की मुनिया में चिकनाई न आ जाये।”
“और वह कैसे आयेगी?” मैंने संशक स्वर में कहा।

“ऐसे!” कहने के बाद राशिद अहाना पर लद गया और उसे सहलाने लगा.. साथ ही एक हाथ से उसका एक वक्ष पकड़ कर उसे दबाते हुए चुचुक को मुंह में रख कर चुभलाने लगा।
“भक.. दूध तो बच्चे पीते हैं और अहाना को अभी दूध आयेगा कहां?” मेरी हंसी छूट गयी।
“जब बच्चा पीता है तब दूध आता है और जब बड़ा पीता है तब मुनिया में चिकनाई आती है।” अहाना ने सिस्कारते हुए कहा।

अब मैं सीरियस हो गयी और दोनों की हरकत देखने लगी.. अहाना की आंखें मुंदी जा रही थीं और वह एक हाथ से अपने ऊपर लदे राशिद की पीठ सहला रही थी तो दूसरे हाथ से उसका सर.. और राशिद दोनों हाथों से उसे नीचे से ऊपर सहला रहा था, उसके दूध दबा रहा था और बारी-बारी एक-एक दूध पी रहा था।

फिर दोनों के चेहरे मिले और दोनों एक दूसरे के होंठ चूसने लगे.. यह नजारा फिल्मों की वजह से मेरा देखा भाला था और उस वक्त मेरे लिये बाकी नजारे से ज्यादा खतरनाक था।
रगों में खून चटकने लगा.. चिंगारियां उड़ने लगीं और दिल धाड़-धाड़ पसलियों में बजने लगा। होंठ खुश्क हो गये और गले में भी कांटे पड़ने लगे।
एक अजीब सी बेचैनी भरी ऐंठन नस-नस में होने लगी।

“हां अब देखो।” सहसा राशिद की आवाज ने मेरी निमग्नता तोड़ दी और मैं जैसे चौंक कर होश में आ गयी और उसे देखने लगी, जो अब मुझे देखता सीधा हो रहा था।

उसने पहले की तरह अहाना की दोनों टांगें फैलायीं और अपना लिंग उसकी योनि पर रखते हुए दबाया.. योनि के गहरे रंग के होंठ खुले और राशिद के लिंग का अग्रभाग उसमें गायब हो गया।
मेरी हैरानी की इन्तहा न रही.. छोटे टमाटर जैसा हिस्सा योनि की फांक में एकदम गुम हो गया।

फिर मेरे पसीना छूट गया यह देख के.. कि धीरे-धीरे उसका समूचा लिंग ही अहाना की योनि की गहराई में उतरता गायब हो गया और उसकी जड़ के बाल अहाना की योनि के आसपास फैले बालों से टकराने लगे।

मैं हैरत से मुंह फाड़े उन दोनों को देख रही थी और वे दोनों मुस्कराते हुए मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मुझे गलत साबित करने पर खुश हो रहे हों।

“अब यकीन करोगी?”
मैंने फंसे कंठ से ‘हाँ’ कहते हुए सहमति में गर्दन हिलाई।

राशिद ने अहाना को एकदम तख़्त के किनारे कर लिया था कि उसके नितम्ब आधे तख़्त से बाहर हो गये थे और दोनों पाँव घुटनों से मोड़ कर इतने पीछे कर दिये थे कि एकदम पेट से लग गये थे और इस तरह उसकी योनि आगे हो कर एकदम उभर आई थी।

जबकि राशिद खड़ा ही था और उसने अपने पेट के निचले हिस्से को इतना दूर रखा था कि मैं उसके बड़े से लिंग को अहाना की योनि से अग्रभाग तक बाहर निकलते और फिर जड़ तक वापस अंदर जाते साफ़-साफ़ देख सकूँ।

“अब इस तरह दोनों लोगों की खुजली एक साथ मिट जाती है और हाथ या किसी बाहरी सहारे की ज़रुरत नहीं पड़ती।” राशिद ने तिरछे चेहरे से मुझे देखते हुए कहा।
“बाहरी सहारा?” मैंने उलझनपूर्ण नेत्रों से उसे देखा।
“वह बाद में समझा देगी अहाना.. अभी तुम फिलहाल देखो कि हम खुजली कैसे मिटाते हैं।”

फिर जैसे दोनों ने मेरी तरफ से ध्यान हटा लिया और रशीद भचाभच धक्के लगाने लगा। बाहर भले बारिश का शोर हो लेकिन फिर भी इतने नज़दीक होती फच-फच मैं आसानी से सुन सकती थी। जहाँ यह खुजली करते राशिद की साँसें भारी हो उठी थीं वहीं अहाना ‘आह-आह’ करके सीत्कार कर रही थी।

फिर थोड़ी देर बाद राशिद ने उसकी योनि के अन्दर से भीगा चमकता लिंग बाहर निकाल लिया और मैं फिर चक्कर में पड़ गयी।
“कहाँ… निकला नहीं सफेदा?”
“अरे इतनी जल्दी थोड़े निकलता बाबा.. काफी देर खुजाना पड़ता है और एक ही आसन में खुजाते-खुजाते तकलीफ हो जाती है।” उसने अहाना को थापक कर उठाते हुए कहा।

अहाना खड़ी हो गयी और फिर एक पाँव नीचे और एक पाँव तख़्त पर रख कर थोड़ा मेरा सहारा लेते हुए झुक सी गयी.. जबकि राशिद उसके पीछे से यूँ चिपक गया कि मैं समझ सकती थी कि उसने पीछे की तरफ से अहाना की योनि में अपना लिंग घुसा दिया होगा।

फिर अब जो उसने धक्के लगाने शुरू किये उसके जांघें अहाना के चूतड़ों से टकरा कर ‘थप-थप’ का शोर करने लगीं। दोनों हाथों से उसने अहाना के दूध पकड़ लिये थे जो अभी एकदम मेरे पास थे और बुरी तरह उन्हें मसल रहा था।

दोनों ही अब ‘सीसी… उम्म्ह… अहह… हय… याह…’ करने लगे थे। काफी देर तक इसी अवस्था में दोनों थप-थप करते रहे और फिर एकदम राशिद हट गया और उसके थपकी देने पर अहाना वापस पहले की तरह लेट गयी।

मैंने उसका लिंग देखा.. वह पूरी तरह किसी लिसलिसे द्रव्य से नहाया हुआ चमक रहा था, जिसे उसने मेरे देखते-देखते वापस अहाना की योनि में घुसा दिया और उसके ऊपर लद गया।

अब वो अहाना पर लदा उसके दूध पी रहा था और दबा रहा था जबकि अहाना ने नीचे से अपनी टांगों में उसकी जांघे कस ली थीं और दोनों हाथों से राशिद के चूतड़ों का ऊपरी हिस्सा जकड़ लिया था और उसे यूँ बार नीचे दबा रही थी जैसे उसके लिंग को और गहराई में उतार लेना चाहती हो।

ठीक यही तो देखा था मैंने… थोड़ी देर पहले, बिजली की रोशनी में। तब मैं समझ न सकी थी कि आखिर हो क्या रहा था लेकिन अब मैं समझ सकती थी कि क्या हो रहा था।

और फिर दोनों की तेज़ कराहें गूंजी।
मैं थोड़ा चौंक गयी और गौर से दोनों को देखने लगी। उन्होंने एक दूसरे को इस कदर सख्ती से भींच लिया था जैसे पसलियाँ तोड़ कर एक दूसरे में समां जाना चाहते हों। कुछ सेकेंड दोनों की कैफियत वही रही, फिर दोनों के जिस्म ढीले पड़ गये।

कुछ और सेकेंड के बाद राशिद अहाना के ऊपर से हट गया और अपना सफेदे में सौंदा हुआ लिंग पास पड़े रुमाल से पोंछने लगा, जबकि मैंने अहाना की योनि देखी तो उसमे से बह-बह कर वही सफ़ेद द्रव्य बाहर आ रहा था।

अब वे दोनों मुझे देख रहे थे और दोनों के चेहरों पर एक अजीब सी मुस्कराहट थी, जबकि मैं सूखे गले और होंठ के साथ उन दोनों के अंगों को देख रही थी।

उस रात मैं अहाना के साथ नीचे आ गयी थी उनकी खुजली मिटने के बाद… फिर अहाना तो सो गयी थी चैन से, लेकिन मुझे सुबह ही नींद आ पाई थी।

एक अजब सी बेचैनी परेशान करती रही थी… नस-नस में एक मादकता भरी ऐंठन होती रही थी। योनि पर हाथ लगाने से करेंट जैसा लग रहा था.. ऐसा लग रहा था जैसे कुछ लावे की तरह उबल रहा है तन बदन में… जो अपने किनारों को तोड़ना चाहता है, लेकिन क्या… कैसे… यह मेरी समझ से परे था और यही बेचैनी मुझे रात भर जगाती रही।

सुबह ग्यारह बजे तक मैं सोती रही। किसी के जगाने पर भी न जगी.. और जब जगी भी तो दिमाग पर एक अजीब सी बोझिलता तारी रही।
जो रात गुजरा था, वह जागते में देखा गया सपने जैसा था.. लेकिन सिर्फ उस पूरे दिन ही नहीं, बल्कि कई दिन तक दिमाग में उसी तरह चलता रहा।

मैंने अहाना से बात करने की कोशिश की, लेकिन उसने हर बार कोई न कोई बहाना बना कर टाल दिया और वह बात भी अधूरी रह गयी कि लड़की कैसा ‘सहारा’ ले सकती है, अपनी खुजली मिटाने के लिये।

उस घटना के करीब दस दिन बाद फिर एक दिन ऐसा मौका बना जब घर पे मैं और अहाना अकेले बचे।
दरअसल अम्मी शाजिया अप्पी को ले कर खाला के यहाँ गयी थीं और मौसम खराब था तो उन्होंने फोन कर दिया था कि देर से लौटेंगी, जबकि सुहैल लखनऊ गया हुआ था और शाम तक वापस आना था।

जाहिर है कि जब मौसम था, मौका था तो अहाना की मुनिया में खुजली मचनी ही थी, लेकिन उसके लिये समस्या यह थी कि राशिद वहां थे ही नहीं.. वह बाराबंकी गये हुए थे।
“कितना अच्छा मौसम था और कितना अच्छा मौका था।” अहाना ने बड़े हसरत भरे अंदाज में कहा।
“अब नहीं हो सकता तो काहे रो रही हो।”
“हो तो सकता है.. दूसरे तरीके से सही।” उसने आंखें चमकाते हुए कहा।
“कैसे?” मेरे लिये उलझन भरी बात थी।

“तुम पूछ रही थी न कि खुजली मिटाने के लिये लड़के को तो हाथ का सहारा है.. लड़की को क्या?”
‘हां-हां.. बताओ?’ मेरी दिलचस्पी फिर पैदा हो गयी।
“बताती हूँ। इससे अच्छा मौका और कहां मिलेगा।” वह हंसती हुई किचन की तरफ चली गयी।

कहानी जारी रहेगी.
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