पति ने दिया दर्द मैं और मेरा लंड बना हमदर्द-2

यह कहानी एक सीरीज़ का हिस्सा है:

पति ने दिया दर्द मैं और मेरा लंड बना हमदर्द-1

पति ने दिया दर्द मैं और मेरा लंड बना हमदर्द-3


दोस्तो, मैं आपको आगे की सेक्स स्टोरी बताने जा रहा हूँ।
वैसे भाभियों की चूत के क्या हाल हैं.. जरा मेल करके बताओ न यार!

दिव्या को मुझसे मिल कर अच्छा लगता था, वो कहती थी कि तुम हो तो थोड़ा अच्छा लगता है.. घर जाकर पति और घरवालों की सुनो तो दिमाग खराब हो जाता है।

इधर ऑफिस में उसको कई लोग चोदना चाहते थे।
ऑफिस के लोग चाय की टेबल पर उसके बारे में डिसकस करते, जैसे ‘यार बड़ा मस्त माल है.. पति ने क्या छोड़ा.. साली और मस्त हो गई है.. एक बार मिल जाए तो इसका सारा अकेलापन मिटा दूँ।’

इस तरह की बातों को सुनने के बाद भी वो सभी लड़कों से हँस कर बात करती.. उनकी डबल मीनिंग बातों को भी एंजाय करते हुए इग्नोर कर देती।
एक लड़का तो उसके पीछे बहुत ही ज्यादा पड़ा था, वो रोज़ उससे किसी न किसी बहाने से मिलने लगा।

मुझे यह अच्छा नहीं लगता था। जब मैं ये बात दिव्या से बोलता.. तो वो कहती कि अरे मिलने में क्या है.. बेचारा वो प्राब्लम ही तो डिसकस करता है.. मैं तुम्हारी ही हूँ.. क्यों सोचते रहते हो?

मुझे उसकी इस तरह की बात पर गुस्सा आ जाता.. तो वो मुझे किस करती और मुझसे लिपट जाती।

अपने घर दिव्या जब मुझसे लिपटी.. तब वो सिर्फ़ टी-शर्ट में थी। चुस्त टी-शर्ट उसकी मस्त फिगर को और उभार देती थी, इसमें उसके बोबे और भी मस्त, टाइट और उभर कर दिखते थे। नीचे उसका शॉर्ट्स जो कि उसकी मस्त गांड और सेक्सी टांगों को दिखाता था।

एक दिन मैं पी के आया.. उसी वक्त वो रूम पर आई। नशे की टुन्नी में उसे देखके मेरा लंड खड़ा हो गया। हम दोनों बातें करते रहे.. मैं उसको छेड़ता रहा।
मैंने कहा- बहुत हॉट लग रही हो..!
बोली- वो तो मैं हमेशा से हूँ।
मैंने कहा- वो तो है.. लेकिन आज तुम्हारे लोटे उभर के दिख रहे हैं।
वो हँस कर झिड़कते हुए कहती- हट बेशरम..

फिर काफ़ी देर बाद वो बोली- अब मुझे जाना चाहिए.. तुम्हारा रूममेट आ गया।
मैंने कहा- तो क्या.. वो अपने रूम में है।

मैंने उसको पकड़ लिया और उठा कर दीवार के सहारे लगा कर उसे चूमना शुरू कर दिया।
उसने मेरे मुँह से मुँह लगाया तो बोली- आई हेट दिस यार.. जब तुम पी करके मुझे चूमते हो।
मैंने कहा- सब छोड़ दूँगा!

हम दोनों एक-दूसरे को चूमते रहे, फिर मैंने उसकी टी-शर्ट ऊपर करना चाही, तो कहने लगी- अब शुरू मत हो जाना।
मैंने कहा- रुका ही नहीं जा रहा है।

मैंने उसकी टी-शर्ट को ऊपर करके ब्रा पर से उसे चूमना शुरू कर दिया।

मैंने कहा- आई लाइक योर दिस ब्रा.. क्या मस्त लगती है।
दिव्या बोली- क्यों.. इसमें क्या खास है?
मैंने कहा- पहली बार यही वाली उतारी थी ना!

वो कातिलाना अदा से मुस्कुराई और फिर चूमने लगी। मैं धीरे से नीचे पहुँच कर उसकी टांगों को चूमने लगा।
उसने भी मेरे चूमने का मजा लिया।
मैंने उसकी जांघें चूमी तो उसने दीवार पकड़ कर बोबे उभार दिए ‘उहह आहह उम्म्ह… अहह… हय… याह… प्लीज़ प्लीज़..’

मैंने उसकी शॉर्ट्स का बटन खोला तो बोली- अह.. रुक जाओ ना!
मैंने उसका हाथ मेरे पजामे के ऊपर रख दिया.. उसने फट से लंड दबा दिया।

उफ लंड की क्या हालत हो गई थी.. वो लंड मसलने लगी, मैं जोर से उसके बोबों से चिपक गया।

फिर मैंने उसके शॉर्ट्स के बटन खोल दिए और अंडरवियर भी खींच कर पैरों तक ले आया।

अब मैंने अपने कपड़े भी उतार दिए और अपना खड़ा लंड उसको दिखाया.. तो कहने लगी- आज ये इतना बेचैन क्यों है?
मैंने कहा- इसके सामने इतना गर्म माल जो है।

मैंने यह कहते हुए उसकी टांगों के बीच में लंड को रगड़ा.. और फिर टांगें खोल कर चूत में लंड को पेल दिया।

‘आ उहह.. आराम से कर ना..’

मैं धक्का पर धक्का लगता गया। उफ.. फाइनली उसकी चूत से लंड निकाल लिया और बाहर झड़ गया। मैं उसकी गर्दन पर चूम रहा था, साथ ही अपनी चौड़ी छाती को उसके मम्मों पर रगड़ता हुआ ऊपर-नीचे हो रहा था.. एकदम गरम माहौल था।

फिर उसने कहा- अब तो घर छोड़ आओ।
मैंने कहा- पक्का जाना है?
कहती- हाँ यार..
मैं उसको छोड़ने गया, मैंने कहा- बाय डार्लिंग..

वो मेरे करीब वापिस आकर गुस्से में बोली- सुनो!
मैंने कहा- बोल?
बोली- दो चीजें कभी मत करना..
मैंने कहा- क्या.. और क्या हुआ?

बोली- कभी बियर पीके मुझे मत चोदना.. और डार्लिंग मत कहना.. साला मेरा हजबेंड करता था.. आई हेट दैट..
मैंने उसके होंठों को चूमा और कहा- वादा रहा.. कोई तेरी पुरानी याद नहीं वापिस दूँगा। हमारा रिश्ता सिर्फ अच्छी यादों के साथ ही रहेगा।

तो वो हँस कर चली गई।

फिर रूम पर पहुँचने के बाद उसका फोन आया- सुनो कल से पीरियड चालू हैं.. ध्यान रखना और तुम एक अलग कमरा ले लो यार.. रूममेट क्या सोचेगा तुम्हारा?
‘कुछ नहीं सोचेगा।’
‘मुझे नहीं पता, जल्दी करो।’

मैंने एक अलग कमरा ले लिया और उसने भी कहा- वाउ… यह अच्छा है।

मुझे वो पल अच्छा नहीं लगता था, जब वो दूसरे लड़कों से बात करती थी क्योंकि वो सिर्फ़ उसको चोद कर दुख पहुँचना चाहते थे.. जबकि मुझे यह अब ग़लत लगता है।

मुझे लगता है कि यार अगर कोई शादी के बाद भी खुश नहीं है.. तो उसको कोई तो चाहिए होता है.. वो एक समझने वाला पार्ट्नर होना चाहिए.. ना कि बस चुदाई करने वाला हो।

हालाँकि चुदाई भी जरूरी होती है.. जोकि दोनों ही चाहते हैं.. लेकिन प्यार से चुदाई हो और दोनों की सहमति से हो, तभी ये सब अच्छा लगता है। जबरदस्ती कुछ भी करने से रिश्ता नहीं चलता है।

एक-दो बार मैंने नोटिस किया कि ऑफिस का एक लड़का दिव्या से मिलने की फिराक में रहता था, वो रात को कोई काम के बहाने उसके रूम पर जाकर उसे शॉर्ट्स और टाइट टी-शर्ट में घूरता रहता था। मेरी इस बात पर दिव्या से बहस होती तो कह देती कि अरे ऐसे-कैसे कुछ करेगा.. तुम हो ना!
मैंने कहा- उसको आने से मना करो।
तो कहती- देखूँगी..

फिर वैलेंटाइन वाले दिन उसकी एक पक्की सहेली आ गई। मैंने मन में भुनभुनाते हुए सोचा कि खड़े लंड पर धोखा हो गया.. चलो कोई बात नहीं.. शाम को प्लान बनाता हूँ। शाम को जब मैं उसके घर गया, तो उस समय वो लड़का भी था।

फिर मैं गुस्से में दिव्या के घर से चला गया। कुछ ही देर बाद उसका कॉल आया।
कहती- सॉरी.. मान जाओ।
मैंने कहा- नहीं।
वो रोने लगी.. कहती- आओ ना!
फिर उसकी सहेली ने भी कहा- प्लीज़ मूड खराब मत करो।

मैं चला गया.. उस वक्त वो लेटी हुई थी, मैंने उसके ऊपर लेट कर उसके बोबे दबा दिए।
वो कहती- नाराज़ हूँ मैं..!
मैंने उसकी गांड पर अपने लंड का प्रेशर बनाया और बोबा मसलते हुए कहा- मना लूँगा।
इतने में उसकी फ्रेंड कमरे में आकर बोली- ओये लव बर्ड्स.. खुले में जरा कंट्रोल करो यार..

दिव्या उठकर उसके पास चली गई और कहती- देखा ना.. ये मुझे कैसे तंग करता है?
मैंने उसकी फ्रेंड से कहा- तंग नहीं कर था.. मना रहा था तेरी दोस्त को!
कहती- चल हट..

फिर मैंने दिव्या को बांहों में ले लिया और चूम लिया, उसकी सहेली ने भी दिव्या को चूमा।

दिव्या बोली- चलो ओये चलो.. खाना खाते हैं।

फिर हम तीनों ने डिनर किया और छत पर आकर बैठ गए। पहले मैं फिर उसकी सहेली उसकी गोद में लेटे रहे और वो हम दोनों को चूमती रही।

मस्त हवा और यह जवान शरीरों की गर्मी.. मजा आने लगा।

कुछ देर में उसकी फ्रेंड सो गई और मैं दिव्या का टॉप ऊपर करके उसके मम्मों को चूसता रहा।

फिर उसने चोदने को मना किया और उसने मेरी ज़िप खोल कर लंड पकड़ कर ब्लोजॉब करते हुए लंड से पानी निकाल दिया।
कुछ देर बाद मैं चला गया और वो दोनों भी नीचे आ कर सो गईं।

अगले दिन सुबह मैं और वो ऑफिस गए.. तो लिफ्ट के पास हमेशा की तरह लिपलॉक किया।
दिव्या बोली- मुझे कुछ बताना है।

हम दोनों ऊपर गए.. जाब ब्रेकफास्ट कर रहे थे तो बोली- तुम्हारे जाने के बाद मेरी फ्रेंड और में नीचे आ गए थे। हम दोनों आपस में लिपटे रहे.. किस करते रहे।
मैंने कहा- ओहो फन…!

दिव्या बोली- वो ऊपर से दबाती रही और मुझसे तेरे लिए बोली कि तू मेरा कितना ख्याल रखता है.. उसकी हो ज़ा।
लेकिन मैंने कहा- हमारे रिश्ते का अंजाम नहीं है।
उसको भी पता है लेकिन कहती- कोशिश करके देखा जाए?
मैंने कहा- जितना साथ लिखा है, उतना समय अच्छे से बिताएँगे। इस रिश्ते को लोग नहीं समझ सकते.. लेकिन हमें पता है कि हमारा रिश्ता क्या है।

वो उदास सी हुई.. तो मैंने कहा- अरे अभी थोड़ी अलग हुए!
वो थोड़ी खिल गई और फिर हम काम करने चले गए।

दोस्तो.. ऐसे रिश्तों को दुनिया नहीं समझ सकती। ये रिश्ते कई बार बिना नाम के इतने अपने होते हैं कि बस.. कुछ नहीं कहा जा सकता। इसमें आपसी समझ ही सबसे जरूरी है।

आपके मेल के इन्तजार में हूँ।
[email protected]